चौंकिए मत. इतनी शातिर चोर नहीं हूँ मैं. पर हाँ चोरी तो की है. वो भी एक बार नहीं दो-दो बार. सुनिए कब, क्या और कैसे और उसके परिणाम भी.
पहली चोरी
मैं कोई 6-7 साल की रही हूँगी. तब हम धनबाद में रहते थे. हम
अपने ताऊ के घर बोकारो गए थे. उनके बच्चे भी हमारी उम्र के ही थे. दो बेटियां थीं.
एक मेरे से बस आठ दिन बड़ी और दूसरी उससे छोटी. बड़ी वाली ने मुझे एक पेन दिखाया.
बहुत ही छोटा सा एक फाउंटेन पेन था. मुश्किल से 5 सेंटीमीटर का. प्यारा सा गुलाबी रंग
और सुंदर सी उसकी निब. वो बहुत गर्व से उससे लिख कर दिखा रही थी. मुझे भी बहुत
पसंद आया. बहुत बार उसे दिखाकर सबके सामने उसकी तारीफ भी की. ताऊ और पापा के सामने
भी. उन्होंने बस “हाँ बेटा, बहुत सुंदर है” कहकर बात टाल दी थी.
मैंने अपने घर की रीत देखी थी. अगर किसी बच्चे(रिश्तेदारों
के) को कोई ऐसी चीज़ पसंद आ जाती तो माँ-पापा उसे कहते- “अच्छी लग रही है बेटा? तो
रख लो. ले जाओ. हम दूसरी ले आयेंगे.” पर यहाँ तो ऐसा कुछ नहीं हुआ. इतनी तारीफ की,
पूरा संकेत दिया कि पो पेन मुझे अच्छा लग रहा है पर ताऊ जी ने तो वैसा कुछ बोला ही
नहीं. सोचा कोई बात नहीं. पर बाल मन था,
लालच गया नहीं. सो वापस निकलते हुए उसे चुरा लिया और अपने साथ ले आई. किसी से कुछ
नहीं कहा.
कुछ दिन तो छिपा कर रखा पर अब दूसरों को दिखाने की इच्छा
मेरी भी तो थी. और उससे लिखने की भी. एक दिन किसी को दिखाते हुए पकड़ी गयी. पापा उस
अनोखे पेन को देखते ही पहचान गए. कड़कदार आवाज़ में पूछा - “ये कहाँ से आया?”
झूठ बोलना फिजूल था और खतरे से खाली भी नहीं था. मैं सर झुका
कर खड़ी हो गयी. पर पापा ऐसे कृत्य के लिए माफ़ करने वालों में से नहीं थे. वो कहते
हैं न – “spare the rod , spoil the child”.
पापा का गुस्सा सातवें आसमान पर था. जोर से डांट कर कहा – “क्या
नहीं देते हम तुम लोगों को. फिर चोरी क्यूँ की. मुझे कह देती मैं ले आता”. चोरी
छोटी हो या बड़ी, चोरी चोरी ही होती है. उनकी बेटी चोरी करे ये उन्हें बिलकुल
बर्दाश्त नहीं हो रहा था.
फिर इतनी पिटाई हुई कि पूछो मत. थप्पड़ तो पापा के जोरदार थे
ही चप्पल भी खूब पड़े. इतनी पिटाई कि माँ को बीच में आना पड़ा. पर फिर भी आज के
बच्चों की तरह एक बार भी ये ख्याल मन में नहीं आया कि मेरे माँ पापा तो मुझसे
प्यार ही नहीं करते, बल्कि बहुत ग्लानि हुई थी अपने किये पर. सोच लिया कि अब कभी
चोरी नहीं करूंगी. सचमुच सबकुछ तो देते हैं माँ पापा.
ज़ाहिर है कि ताऊ जी को फ़ोन पर तुरंत इसकी सूचना दी गयी. उनसे
माफ़ी मांगी गयी. उस दिन मेरे कारण पापा का सिर शर्म से झुका था. पर बस उसी दिन.
दूसरी चोरी
अब आप कहेंगे कि जब चोरी से तौबा कर लिया था तो फिर चोरी क्यूँ?
नहीं, नहीं, ये वैसी चोरी नहीं थी. सुनिए तो क्या हुआ था.
तब मैं शायद 10 साल की थी. हम पटना में थे. मेरे घर मेरी एक
मौसेरी मौसी का परिवार रहने आया था कुछ दिनों के लिए. मौसी की एक छोटी सी 7-8
महीने की बच्ची थी. उसकी रोज मलाई से मालिश होती. एक दिन बाहर बरामदे पर उसकी मालिश
करते हुए मौसी ने मुझसे किचेन से कुछ लाने को कहा.
जब मै किचेन में गयी तो मुझे ग्लैक्सो(मिल्क पाउडर) का एक
बिलकुल नया डब्बा वहां दिखा. उसी बच्ची के लिए था. मुझे मिल्क पाउडर बहुत ही पसंद
है. सूखा फांकना भी और उससे बना दूध भी. पर मौसी से उतनी दोस्ती नहीं थी की
मांगूं. सोचा थोडा चुप-चाप फांक लेती हूँ किसे पता चलेगा.
ढक्कन खोला. एक मुट्ठी भर कर पाउडर निकाला और मुँह में ठूंस
लिया. ठूंसते ही थूकने लगी. पता नहीं क्या था उस डब्बे में. अजीब सा स्वाद था.
बहुत गन्दा. कुछ गले के अन्दर तक चला गया था. चिल्लाने लगी. उल्टियाँ करने लगी.
सभी लोग दौड़े चले आये. मेरी आवाज़ का ढिंढोरा पिट गया था. सभी को पता चल गया था
मेरी चोरी का.
मौसी से पता चला कि उसमें तो विम पाउडर रखा था बच्ची के बर्तन
धोने के लिए.
मुझे उल्टियाँ करायी जाने लगी ताकि अन्दर जो गया वो बाहर
निकल जाये. कोई और चोरी का मौका होता तो जम कर पिटाई होती पर यहाँ लोग मेरी जान बचाने
में लगे थे. पापा भी ऑफिस चले गए थे. इसीलिए पिटाई से छुटकारा मिल गया. वैसे भी
सजा और सीख तो मिल ही गयी थी. पापा से ये
बात छुपायी गयी क्यूंकि माँ को पता था आगे क्या होता.
पर मैं मन ही मन सोच रही थी- “ऐसे साफ़ सुथरे सुन्दर डब्बे
में कोई विम रखता है क्या”?
आप सबको ये बता दूं कि उस पेन की चोरी के बाद चीजों की चोरी
तो मैंने कभी नहीं की और परीक्षा में भी कभी नक़ल नहीं की पर मिल्क पाउडर तो मैं तब
भी निकाल निकाल कर खाती थी जब मेरी दोनों बेटियां छोटी थीं. हाँ तब वो चोरी डकैती में
बदल गयी थी. क्यूंकि मैं ये काम खुले आम करती थी.
शायद आज भी करूँ. क्यूंकि मिल्क पाउडर का शौक अब भी बरक़रार
है.

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