ये जिस टॉप और ट्राउजर्स सेट में आप मुझे देख रहे हैं, ये मैंने उस दिन पहना था जिस दिन मुंबई में मेरे साथ दुर्घटना घटी थी यानि रविवार 16 फरवरी 2025 को। हालांकि ये सेट मुझे बहुत प्रिय है पर उस दिन के बाद से मैंने इसे नहीं पहना।
जब भी इसे पहनने का सोचती, एक अज्ञात भय मेरे अंदर घर कर जाता। पूरे शरीर में सिहरन दौड़ जाती और उस दिन का पूरा घटनाक्रम आँखों के सामने जीवंत हो उठता। एक फोबिया हो गया था कि अगर मैंने इसे पहना तो फ़िर कहीं कुछ न हो जाये, कोई दुर्घटना न घट जाये।
पर कल यानि 30 मई को साढ़े तीन महीने बाद फिजियोथेरेपी के लिये जाते समय बहुत हिम्मत करके इसे पहन ही लिया। पहनते समय दिल जोरों से धड़क रहा था।
डर तब भी था। एक एक कदम संभाल कर रख रही थी। घर से हॉस्पिटल और फिर हॉस्पिटल से घर, हर पल भय मेरे दिलों दिमाग में था।
खैर, सही सलामत घर लौट आई। इस सेट पर से मेरा फोबिया दूर हुआ।
ऐसा ही होता है। सिर्फ मेरे साथ नहीं, शायद आप में से भी बहुतों के साथ ये हुआ होगा।
इस ड्रेस को पहनने से सक्सेस मिलता है, इस वाले से इंटरव्यू अच्छा जाता है, इसे कभी मत पहनना, बनता काम बिगड़ जायेगा.. इस तरह की बातें हमारे दिमाग में घर कर जाती हैं और हम उसी अनुसार व्यवहार करते हैं।
दिमाग की पोजीशन सबसे ऊपर है, शायद इसीलिए कि दिल जब ग़लत सोचे तो दिमाग अपने लॉजिक से उसपर विजय पाये पर यहां पर पता नहीं दोनों एक दूसरे का पूरी तरह से साथ देने लगते हैं।
जरूरत है फोबिया पर विजय पाने की। 😊😊😊



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